जिंदगी की हकीकत


जिंदगी की हकीकत से रूबरू एक ग़ज़ल के चंद शेर

इस तरह जिंदगी का सफर कर रहा है आदमी ,
जिंदा रहने की चाहत में रोज मर रहा है आदमी ।

हर सुबह समेटता है खुद के टूटे टुकडों को ,
हर शाम फिर से टूट कर बिखर रहा है आदमी ।

सुकून को गवां बैठा है  सुकून की ही तलाश में,
जूनून के ये किस दौर से गुजर रहा है आदमी ।

ख्वाहिशों का पहाड़ खड़ा कर के अपने इर्द-गिर्द,
उस पर बैसाखियों के सहारे चढ़ रहा है आदमी ।

तरक्की की ऊंचाइयों ने रिश्तो को बौना कर दिया,
काबिलियत के ये कैसे कसीदे गढ़ रहा है आदमी ।

जिंदगी का मतलब तो बस सांसे लेना ही रह गया,
हर वक्त, हर लम्हे अब यही तो कर रहा है आदमी ।

                                               -- दिनेश

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